परंपरागत भारतीय खेल: एक सशक्त माध्यम
एक – भारत में प्राचीनकाल से ही खेलों की एक समृद्ध परंपरा रही है। भारत के
वैदिककालीन खेल भारतीय सभ्यता की उस समग्र दृष्टि का प्रतीक हैं जिसमें
स्वास्थ्य, अनुशासन, युद्ध-तत्परता, बौद्धिक क्षमता और आध्यात्मिक संतुलन
एक साथ विकसित होते हैं। इन सभी की पुष्टभूमि में सामान्य और विद्याधर से
लेकर तपस्वी तक के स्तरों पर खेलों का उपयोग होता था। आधुनिक खेलों की
संरचना और स्वरूप भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी मूल प्रेरणा आज भी हमारे
परम्परागत खेलों से जुड़ी दिखाई देती है। वैदिक काल में खेलों के माध्यम से
नागरिकों को ‘सेवा’ अर्थात् नैतिक-समाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था के अनुकूल
जीवन-शैली का अभ्यास कराया जाता था। हमारे ये प्राचीन खेल प्रतिपादन या मनोरंजन के साधन मात्र नहीं थे, अपितु ये जीवन के कुछ प्रमुख सिद्धांतों पर
आधारित थे। कर्मयोग और आत्मनियमन, साहस और तप, संयम और मर्यादा, धर्म-कर्तव्य पालन का अभ्यास, मन-शरीर-सम्पादन जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों की पूर्ति इन खेलों के माध्यम से की जाती थी। भारतीय परंपरा में खेल केवल शारीरिक गतिविधियाँ नहीं हैं, वे संतुलन, सामंजस्य और आत्मविकास का साधन हैं। वैदिक एवं उपनिषद्कालीन ग्रंथों में खेल (जिसे ‘लीला’ भी कहा गया है) को ब्रह्म का आध्यात्म माना गया है। इसका अर्थ ‘लीला’ का तात्पर्य है सृजन, सहजता, प्रसन्नता और रचनात्मक ऊर्जा का विकास। इसी दार्शनिक दृष्टि ने भारतीय जीवन में खेलों को साधना, सहयोग और आत्मअनुशासन का माध्यम बनाया। पूर्ण लेख देखने के लिए क्लिक करे
