भारतीय दर्शन और विज्ञान

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में शिक्षा प्रा को ही ‘विद्या’ कहा जाता था। तब शिक्षा ज्ञान और अनुभव के सम्मिश्रण से निर्मित थी। यह विद्या विज्ञानसम्मत और संस्कारप्रवण हुआ करती थी। इसलिए विद्या और विज्ञान का परस्पर संबंध तब से लेकर आज तक अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है, और आगे भी बना रहेगा। यह सच है कि हमारे देश में स्वाधीनता पश्चात् के बीते दशकों की शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का अर्थ प्राचीन ‘विद्या’ के समान ‘श्रेष्ठ’ नहीं रहा। बालक का सर्वांगीण विकास प्रत्येक कालखंड में शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य होता है। यदि कोईशिक्षा मनुष्य को श्रेष्ठताबोध नहीं कराती और उसे हीनताबोध से मुक्त नहीं कराती, तो वह सार्थक शिक्षा नहीं कही जा सकती। परतंत्र भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गई भारत की शिक्षा पद्धति इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करने वाली रही, जिसे कई दशकों तक भारत की केंद्रीय शिक्षा पद्धति के रूप में कुछेक परिवर्तनों के साथ चलाया जाता रहा। यह भारत की सभ्यता और संस्कृति के सर्वथा प्रतिकूल थी। इस शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों के मन में पश्चिम के प्रति निरंतर आकर्षण तथा भारत के प्रति विकर्षणबोध का ही विकास अधिक किया। पूर्ण लेख देखने के लिए क्लिक करे

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