लोक व्यवहार में वेदों का महत्त्व

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ अर्थात् ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। परंतु ज्ञान केवल सूचना नहीं, अपितु वह विवेक, तर्कसंगति, अनुभव और व्यवहार का समन्वय है । भारतीय दर्शन में इसी ज्ञान को ‘विद्या’ कहा गया, जिससे आत्मा को प्रकाश मिलता है। कालांतर में यही विद्या ‘शिक्षा’ कहलायी। यद्यपि इसका स्वरूप कोई भी रहा हो, पर यह तो स्पष्ट ही है कि ज्ञान ही मनुष्य जीवन की आधारशिला है जो जीवन को दिशा, उद्देश्य और सार्थकता प्रदान करता है। विश्व में ज्ञान की पद्धतियों की विकास यात्रा आधुनिक समय में कंप्यूटर तथा इंटरनेट से होती हुई आज ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ तक आ पहुँची ।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आज मानव- जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, व्यापार, शासन, कला, शोध, अनुसंधान आदि में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा इस नवीनतम तकनीकी युग में प्रासंगिक है या फिर वह केवल अतीत की स्मृति बनकर रह जाएगी? वास्तविकता यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य का पथ-प्रदर्शक भी है। भारत की ज्ञान परंपरा की जड़ें हमारे वेद, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र, काव्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र जैसे गहन आर्ष ग्रंथों में निहित है।
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