भारतीय नववर्ष : सनातन परम्परा में खगोलीय और वैज्ञानिक दृष्टि

भारतीय सनातन काल गणना की संकल्पना विश्व की उत्पत्ति और अवसान के विभिन्न चक्रों मन्वंतरों के लाखों वर्षों की गणना की वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक पद्धति है। भारतीय सनातन परंपरा में खगोल विज्ञान और उसके सामाजिक- सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए ज्योतिष विज्ञान तथा सौर- चंद्र की गतियों से बनने वाली काल की लघु और बृहत् इकाइयों का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

हम जानते हैं कि सूर्य से पृथ्वी की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है फिर भी 77 करोड़ 70 लाख किलोमीटर दूरी पर स्थित बृहस्पति की तुलना में यह बहुत निकट है। पृथ्वी और सूर्य की यह दूरी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि यह बुध ग्रह ( मरकरी) की भांति सूर्य के निकट होती तो हम प्रकाश के तेज से अंधे और ताप से भस्म हो जाते और यदि बृहस्पति की भाँति दूर होती तो शीत से सदा के लिए हम जम जाते। दूसरी ओर वर्ष में एक बार सूर्य के चारों ओर घूमने के साथ-साथ पृथ्वी अपनी धुरी पर स्वयं भी घूमती है और 24 घंटे में एक चक्कर पूरा कर लेती है। इस अवधि में जो भाग सूर्य के सामने रहता है वहाँ दिन और दूसरी ओर रात रहती है। पृथ्वी की धुरी एक ओर झुकी हुई है, इसलिए सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी एक सिरा सूर्य से अधिक निकट होता है तो कभी दूसरा, इसी से सर्दी, गर्मी आदि ऋतुएँ होती हैं।   पूर्ण लेख देखने के लिए क्लिक करे

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